भारत की भागीदारी पर संकट, अदालती फैसले से उलझा शीतकालीन खेलों का सपना
फरवरी का महीना शीतकालीन खेल प्रेमियों के लिए हमेशा खास होता है, लेकिन इस बार भारत के लिए यह उत्साह के साथ-साथ चिंता भी लेकर आया है। Winter Olympics 2026 की शुरुआत 6 फरवरी से इटली के मिलानो-कोर्तिना क्षेत्र में होने जा रही है, लेकिन भारतीय दल की भागीदारी से जुड़ा मामला अंतिम समय में कानूनी और प्रशासनिक उलझनों में फंस गया है। खास तौर पर क्रॉस-कंट्री स्कीयर स्टैनज़िन लुंडुप से जुड़ा विवाद भारतीय खेल प्रशासन पर कई गंभीर सवाल खड़े करता है।
उद्घाटन से पहले बढ़ी मुश्किलें
इटली में होने वाले इस प्रतिष्ठित टूर्नामेंट के लिए भारतीय दल की घोषणा पहले ही कर दी गई थी। भारतीय टीम में दो एथलीट शामिल किए गए थे, जिनमें से एक स्टैनज़िन लुंडुप थे। लेकिन दिल्ली हाईकोर्ट के हालिया फैसले ने लुंडुप की भागीदारी पर रोक लगा दी। यह फैसला ऐसे समय आया है जब Winter Olympics 2026 की तैयारियां अंतिम चरण में हैं और आयोजक देशों के साथ सभी तकनीकी औपचारिकताएं लगभग पूरी हो चुकी थीं।
दिल्ली हाईकोर्ट ने चयन प्रक्रिया में कथित विसंगतियों को आधार बनाते हुए लुंडुप को प्रतिस्पर्धा से बाहर कर दिया। इस फैसले के बाद लुंडुप नई दिल्ली में ही फंसे हुए हैं, जबकि भारतीय दल के अन्य सदस्य पहले ही इटली पहुंच चुके हैं।
चयन विवाद की जड़ में क्या है मामला?
स्टैनज़िन लुंडुप का चयन आसान नहीं था। उन्होंने पिछले वर्ल्ड चैंपियनशिप में भारत के लिए अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया था और उसी आधार पर भारत को एक बेसिक कोटा मिला था। यह कोटा देश के लिए ऐतिहासिक माना गया, क्योंकि इससे भारतीय शीतकालीन खेलों को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिलने की उम्मीद थी। लेकिन चयन को चुनौती देने वाले खिलाड़ी मंजीत ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जिसके बाद Winter Olympics 2026 में भारत की तैयारी पर सवाल खड़े हो गए।
दिलचस्प बात यह है कि मंजीत और लुंडुप दोनों ही आर्मी विंटर स्पोर्ट्स नोड, गुलमर्ग से जुड़े हुए हैं। यानी विवाद व्यक्तिगत से ज्यादा प्रशासनिक और चयन प्रक्रिया से जुड़ा हुआ है।
आईओए और आईओसी के बीच पत्राचार
इस पूरे मामले में भारतीय ओलंपिक संघ (IOA) की भूमिका भी जांच के दायरे में आ गई है। IOA ने अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति (IOC) को स्पष्ट किया कि लुंडुप का नाम पहले ही लंबी सूची (लॉन्ग लिस्ट) में भेजा जा चुका था और अंतिम समय में बदलाव संभव नहीं है। लेकिन IOC ने मंजीत के नाम को सिरे से खारिज कर दिया क्योंकि उनका नाम समय पर दी गई सूची में शामिल नहीं था।
IOC ने यह भी साफ किया कि Winter Olympics 2026 में भारत का प्रतिनिधित्व पूरी तरह खत्म नहीं हो रहा है, क्योंकि अल्पाइन स्कीयर आरिफ मोहम्मद खान पहले से ही क्वालिफाई कर चुके हैं और वे उद्घाटन समारोह में भारतीय ध्वजवाहक होंगे।
उद्घाटन समारोह और लुंडुप की अनुपस्थिति
मिलानो-कोर्तिना ओलंपिक की खास बात यह है कि इसका उद्घाटन समारोह एक स्थान पर नहीं, बल्कि चार अलग-अलग स्थानों पर आयोजित किया जा रहा है। भारत को भी इनमें से एक स्थान पर ध्वज ले जाने का मौका मिलना था। पहले योजना थी कि स्टैनज़िन लुंडुप भी ध्वजवाहक बनेंगे, लेकिन अदालती रोक के कारण यह संभव नहीं हो सका।
आयोजन समिति लगातार IOA से संपर्क में थी और लुंडुप की स्थिति के बारे में जानकारी मांग रही थी। लेकिन जैसे-जैसे समय निकलता गया, Winter Olympics 2026 में उनके शामिल होने की संभावना धूमिल होती चली गई।
खिलाड़ी, सरकार और अनुमति का सवाल
हालांकि एथलीट सरकार के खर्च पर नहीं जा रहे हैं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए खेल मंत्रालय से मंजूरी जरूरी होती है। लुंडुप के साथ जाने वाले अधिकारी भी नई दिल्ली में ही रुके हुए हैं, जिससे साफ है कि प्रशासनिक स्तर पर स्थिति अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है।
इस बीच लुंडुप ने दिल्ली हाईकोर्ट में शीघ्र सुनवाई के लिए आवेदन करने का फैसला किया है। उनका मानना है कि यदि समय रहते फैसला आ जाए तो वे प्रतियोगिता में हिस्सा ले सकते हैं, हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि Winter Olympics 2026 जैसे बड़े आयोजन में आखिरी समय पर बदलाव लगभग नामुमकिन होता है।
आरिफ मोहम्मद खान पर टिकी निगाहें
भारतीय दल के लिए राहत की बात यह है कि अल्पाइन स्कीयर आरिफ मोहम्मद खान पहले ही इटली पहुंच चुके हैं और वे उद्घाटन समारोह में भारतीय झंडा थामेंगे। उनकी मौजूदगी यह सुनिश्चित करती है कि भारत पूरी तरह अनुपस्थित नहीं रहेगा। फिर भी, दो खिलाड़ियों की टीम के बजाय एक ही एथलीट का प्रतिनिधित्व करना भारत की सीमित तैयारियों को उजागर करता है।
भारतीय शीतकालीन खेलों के लिए सबक
यह पूरा विवाद भारतीय शीतकालीन खेल ढांचे की कमजोरियों को उजागर करता है। चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता, समयबद्ध कानूनी समाधान और अंतरराष्ट्रीय नियमों की समझ—इन सभी की कमी इस मामले में साफ दिखाई दी। Winter Olympics 2026 में भारत की सीमित मौजूदगी भविष्य के लिए चेतावनी भी है कि यदि इन खेलों को बढ़ावा देना है तो प्रशासनिक सुधार जरूरी हैं।
अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की छवि
ओलंपिक जैसे वैश्विक मंच पर अंतिम समय में अदालतों और विवादों में उलझना भारत की छवि के लिए नुकसानदेह माना जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि भारत को नियमित रूप से शीतकालीन खेलों में प्रतिस्पर्धी बनना है, तो नीतिगत स्तर पर दीर्घकालिक योजना बनानी होगी। Winter Olympics 2026 ने यह साफ कर दिया है कि केवल व्यक्तिगत प्रतिभा काफी नहीं, बल्कि मजबूत सिस्टम भी उतना ही जरूरी है।
आगे क्या?
आने वाले दिनों में सभी की नजरें दिल्ली हाईकोर्ट पर होंगी, जहां लुंडुप की याचिका पर फैसला आ सकता है। अगर फैसला उनके पक्ष में भी आता है, तब भी समय और लॉजिस्टिक्स बड़ी चुनौती बने रहेंगे। वहीं IOA और खेल मंत्रालय को भी यह तय करना होगा कि भविष्य में इस तरह की स्थिति दोबारा न बने।
निष्कर्ष
कुल मिलाकर, Winter Olympics 2026 भारत के लिए उम्मीदों और चुनौतियों का मिला-जुला पैकेज लेकर आया है। एक ओर आरिफ मोहम्मद खान जैसे एथलीट भारत का नाम रोशन करने को तैयार हैं, वहीं दूसरी ओर स्टैनज़िन लुंडुप का मामला व्यवस्थागत खामियों की याद दिलाता है। भविष्य में यदि भारत को शीतकालीन खेलों में मजबूत उपस्थिति बनानी है, तो इस अनुभव से सीख लेकर ठोस सुधार करने होंगे। Winter Olympics 2026 भले ही एक संस्करण हो, लेकिन इससे मिले सबक भारतीय खेल इतिहास के लिए लंबे समय तक महत्वपूर्ण रहेंगे।
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