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Jantar Mantar Protest: महबूबा मुफ्ती ने फारूक अब्दुल्ला का न्योता ठुकराया, अनुच्छेद 370 और राजनीतिक बंदियों की रिहाई की रखी शर्त

Jantar Mantar Protest

दिल्ली: में होने वाला Jantar Mantar Protest जम्मू-कश्मीर की राजनीति का केंद्र बन गया है। राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग को लेकर नेशनल कॉन्फ्रेंस द्वारा आयोजित इस आंदोलन से पहले पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती ने एक बड़ा राजनीतिक फैसला लेते हुए फारूक अब्दुल्ला का न्योता ठुकरा दिया। उन्होंने साफ कहा कि यदि आंदोलन के एजेंडे में अनुच्छेद 370 की बहाली और राजनीतिक बंदियों की रिहाई शामिल नहीं की जाती, तो पीडीपी इस Jantar Mantar Protest में भाग नहीं लेगी।

महबूबा मुफ्ती के इस फैसले ने जम्मू-कश्मीर की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। एक ओर नेशनल कॉन्फ्रेंस राज्य का दर्जा बहाल करने को प्राथमिक मुद्दा बना रही है, वहीं पीडीपी का कहना है कि केवल राज्य का दर्जा मांगना लोगों के संवैधानिक अधिकारों के साथ समझौता होगा।

क्या है Jantar Mantar Protest?

नेशनल कॉन्फ्रेंस ने 20 जुलाई को दिल्ली के जंतर-मंतर पर एक बड़ा प्रदर्शन आयोजित करने की घोषणा की है। इस Jantar Mantar Protest का मुख्य उद्देश्य जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा वापस दिलाने की मांग को राष्ट्रीय स्तर पर उठाना है। पार्टी ने इंडिया गठबंधन के सभी दलों और कई अन्य राजनीतिक नेताओं को इसमें शामिल होने का निमंत्रण दिया है।

पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला और उमर अब्दुल्ला इस आंदोलन को जम्मू-कश्मीर के लोगों की लोकतांत्रिक आकांक्षाओं की आवाज बता रहे हैं। उनका कहना है कि केंद्र सरकार ने 2019 में राज्य का दर्जा समाप्त कर उसे केंद्र शासित प्रदेश में बदल दिया, जिसे अब बहाल किया जाना चाहिए।

महबूबा मुफ्ती ने क्यों ठुकराया न्योता?

महबूबा मुफ्ती ने फारूक अब्दुल्ला को भेजे दो पन्नों के पत्र में कहा कि केवल राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग जम्मू-कश्मीर के लोगों की वास्तविक आकांक्षाओं को छोटा कर देती है। उन्होंने लिखा कि यह लोगों के साथ “विश्वासघात” होगा यदि आंदोलन अनुच्छेद 370 और अनुच्छेद 35A की बहाली की मांग को छोड़ दे।

उन्होंने कहा कि Jantar Mantar Protest में शामिल होने का निर्णय तभी लिया जाएगा जब आंदोलन के केंद्र में संवैधानिक अधिकारों की बहाली और राजनीतिक बंदियों की रिहाई हो।

महबूबा मुफ्ती ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर भी लिखा कि केवल राज्य का दर्जा मांगने वाला आंदोलन भाजपा के उस नैरेटिव को वैधता देगा, जिसमें अनुच्छेद 370 के मुद्दे को पीछे धकेल दिया गया है।

5 अगस्त 2019 का संदर्भ

महबूबा मुफ्ती ने अपने पत्र में 5 अगस्त 2019 का विशेष उल्लेख किया। इसी दिन केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा समाप्त करते हुए अनुच्छेद 370 के अधिकांश प्रावधानों को निष्प्रभावी कर दिया था और राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित कर दिया था।

उन्होंने कहा कि यदि Jantar Mantar Protest केवल राज्य का दर्जा बहाल करने तक सीमित रहता है, तो इसे 5 अगस्त 2019 के फैसले को अप्रत्यक्ष रूप से स्वीकार करने के रूप में देखा जा सकता है।

पीपुल्स कॉन्फ्रेंस और अपनी पार्टी भी अलग

इस राजनीतिक विवाद में पीपुल्स कॉन्फ्रेंस और अपनी पार्टी ने भी नेशनल कॉन्फ्रेंस के आंदोलन से दूरी बना ली है। पीपुल्स कॉन्फ्रेंस के नेता सज्जाद लोन ने कहा कि यह Jantar Mantar Protest “अनुच्छेद 370 और 35A को दफनाने की प्रक्रिया” बन सकता है।

उनका मानना है कि यदि राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग को ही अंतिम लक्ष्य बना दिया गया, तो विशेष दर्जे की बहाली का मुद्दा कमजोर पड़ जाएगा।

कांग्रेस ने दिया समर्थन

जहां पीडीपी और कुछ अन्य दल आंदोलन से अलग हो गए हैं, वहीं कांग्रेस ने Jantar Mantar Protest में शामिल होने की घोषणा की है। जम्मू-कश्मीर कांग्रेस अध्यक्ष तारिक हमीद कर्रा ने कहा कि पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व भी इस प्रदर्शन में हिस्सा लेगा।

हालांकि अभी यह स्पष्ट नहीं है कि राहुल गांधी स्वयं इसमें शामिल होंगे या नहीं, लेकिन कांग्रेस ने इस आंदोलन को समर्थन देकर राजनीतिक समीकरणों को और रोचक बना दिया है।

कांग्रेस की ‘Statehood Plus’ मांग

कांग्रेस ने केवल राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग से आगे बढ़ते हुए “Statehood Plus” की अवधारणा पेश की है। वरिष्ठ कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने कहा कि जम्मू-कश्मीर के लोगों के “छिने हुए अधिकारों” को वापस दिलाना आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि Jantar Mantar Protest राज्य का दर्जा बहाल करने के लिए है, लेकिन कांग्रेस पिछले दो वर्षों से “Statehood Plus” की बात कर रही है। इसका अर्थ है राज्य का दर्जा, भूमि अधिकारों की संवैधानिक गारंटी और स्थानीय लोगों के रोजगार अधिकारों की सुरक्षा।

राजनीतिक दांव-पेच तेज

जंतर-मंतर पर होने वाला यह प्रदर्शन अब केवल राज्य का दर्जा बहाल करने का आंदोलन नहीं रह गया है, बल्कि जम्मू-कश्मीर के भविष्य की राजनीतिक दिशा तय करने वाला मंच बनता जा रहा है।

नेशनल कॉन्फ्रेंस चाहती है कि Jantar Mantar Protest को व्यापक विपक्षी समर्थन मिले और केंद्र सरकार पर दबाव बनाया जाए। दूसरी ओर पीडीपी यह सुनिश्चित करना चाहती है कि अनुच्छेद 370 की बहाली का मुद्दा राजनीतिक एजेंडे से बाहर न हो।

लोगों की अपेक्षाएं

जम्मू-कश्मीर के कई नागरिक संगठनों का कहना है कि राज्य का दर्जा बहाल होना महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके साथ-साथ संवैधानिक और लोकतांत्रिक अधिकारों की बहाली पर भी चर्चा होनी चाहिए।

इसी कारण Jantar Mantar Protest को लेकर अलग-अलग राजनीतिक दलों की रणनीति और प्राथमिकताएं सामने आ रही हैं।

क्या होगा आगे?

20 जुलाई को होने वाले Jantar Mantar Protest पर अब पूरे देश की नजर है। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि कितने विपक्षी दल इसमें शामिल होते हैं और क्या आंदोलन केवल राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग तक सीमित रहता है या अनुच्छेद 370 और अन्य संवैधानिक मुद्दे भी प्रमुखता से उठाए जाते हैं।

यदि कांग्रेस, नेशनल कॉन्फ्रेंस और अन्य विपक्षी दल एकजुट होकर केंद्र सरकार पर दबाव बनाते हैं, तो जम्मू-कश्मीर के मुद्दे पर राष्ट्रीय राजनीति में नई बहस शुरू हो सकती है। वहीं पीडीपी की दूरी इस बात का संकेत है कि विपक्षी खेमे में भी इस मुद्दे पर पूर्ण सहमति नहीं है।

निष्कर्ष

दिल्ली का Jantar Mantar Protest जम्मू-कश्मीर की राजनीति में एक निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है। महबूबा मुफ्ती द्वारा फारूक अब्दुल्ला का न्योता ठुकराना इस बात का संकेत है कि राज्य का दर्जा बहाल करने और अनुच्छेद 370 की बहाली को लेकर राजनीतिक दलों के बीच गहरे मतभेद मौजूद हैं।

नेशनल कॉन्फ्रेंस इस आंदोलन को राज्य के अधिकारों की लड़ाई बता रही है, जबकि पीडीपी इसे अधूरा संघर्ष मानती है। कांग्रेस ने “Statehood Plus” की मांग के साथ इस बहस को और व्यापक बना दिया है। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि Jantar Mantar Protest जम्मू-कश्मीर की राजनीति में किस दिशा का संकेत देता है और क्या यह आंदोलन केंद्र सरकार की नीतियों पर कोई प्रभाव डाल पाता है।

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