Supriya Sule: बीजेपी की ‘दो-तिहाई की रणनीति’ में सुप्रिया सुले के रुख़ से बढ़ी राजनीतिक हलचल
Supriya Sule एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ गई हैं। संसद के आगामी मानसून सत्र से पहले भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) द्वारा संविधान संशोधन और परिसीमन (Delimitation) विधेयक को दोबारा लाने की तैयारियों के बीच Supriya Sule के ताजा बयान ने राजनीतिक गलियारों में नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) की वरिष्ठ नेता ने स्पष्ट किया है कि यदि प्रस्तावित विधेयक में सभी राज्यों की लोकसभा सीटों में समान रूप से 50 प्रतिशत वृद्धि का स्पष्ट प्रावधान शामिल किया जाता है, तो उनकी पार्टी इस विधेयक का समर्थन करने पर विचार कर सकती है।
यह बयान ऐसे समय आया है जब केंद्र सरकार संसद में दो-तिहाई बहुमत जुटाने की कोशिशों में लगी हुई है। विपक्षी दलों में टूट-फूट और बदलते राजनीतिक समीकरणों के बीच Supriya Sule का यह रुख भाजपा के लिए राहत की संभावना भी माना जा रहा है, वहीं विपक्ष के लिए नई चुनौती भी बन सकता है।
मानसून सत्र से पहले क्यों बढ़ी राजनीतिक हलचल?
20 जुलाई से शुरू होने वाला संसद का मानसून सत्र मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल का सबसे महत्वपूर्ण सत्र माना जा रहा है। सरकार इस दौरान महिला आरक्षण लागू करने और परिसीमन से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक को दोबारा संसद में पेश करने की तैयारी कर रही है।
पिछले विशेष सत्र में यह विधेयक आवश्यक दो-तिहाई बहुमत नहीं जुटा पाने के कारण पारित नहीं हो सका था। अब सरकार पहले समर्थन सुनिश्चित करना चाहती है और उसके बाद ही विधेयक पेश करने की रणनीति बना रही है।
इसी बीच Supriya Sule द्वारा दिया गया बयान राजनीतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि उनकी पार्टी इंडिया गठबंधन का हिस्सा है और उसका रुख संसद में सरकार के लिए निर्णायक साबित हो सकता है।
आखिर क्या है सरकार की नई रणनीति?
सूत्रों के अनुसार सरकार दो बड़े प्रस्तावों पर काम कर रही है।
पहला प्रस्ताव महिलाओं के लिए आरक्षण को वर्ष 2029 तक लागू करने से जुड़ा है।
दूसरा प्रस्ताव परिसीमन के जरिए लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर लगभग 850 करने का है।
इन दोनों प्रस्तावों को संविधान संशोधन की आवश्यकता होगी, जिसके लिए लोकसभा और राज्यसभा दोनों में दो-तिहाई बहुमत जरूरी है।
भाजपा को उम्मीद है कि विपक्ष के कई दल या उनके सांसद इस बार सरकार का समर्थन कर सकते हैं।
लोकसभा में भाजपा को कितने वोट चाहिए?
वर्तमान लोकसभा में एनडीए के पास लगभग 293 सांसद हैं।
संविधान संशोधन विधेयक पारित कराने के लिए लगभग 360 सांसदों के समर्थन की आवश्यकता होगी।
हाल के राजनीतिक घटनाक्रमों के बाद भाजपा को कुछ अतिरिक्त समर्थन मिलने की संभावना बनी है।
बताया जा रहा है कि तृणमूल कांग्रेस के कई सांसद एनडीए के समर्थन में आ चुके हैं। शिवसेना (यूबीटी) के कुछ सांसद भी सत्ता पक्ष के साथ दिखाई दे रहे हैं।
इसके बावजूद भाजपा अभी भी आवश्यक संख्या से पीछे है।
यहीं पर Supriya Sule और उनकी पार्टी का रुख बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
क्या है सुप्रिया सुले की शर्त?
Supriya Sule ने साफ शब्दों में कहा कि यदि सरकार लिखित रूप में यह सुनिश्चित करती है कि देश के सभी राज्यों की लोकसभा सीटों में समान रूप से 50 प्रतिशत वृद्धि होगी, तो उनकी पार्टी इस प्रस्ताव का समर्थन करने पर विचार कर सकती है।
उन्होंने कहा कि दक्षिण भारत के कई राज्यों को आशंका है कि केवल जनसंख्या के आधार पर परिसीमन होने से उनका प्रतिनिधित्व कम हो सकता है।
इसी कारण सरकार को स्पष्ट फार्मूला सामने रखना चाहिए ताकि किसी भी राज्य के साथ अन्याय न हो।
दक्षिणी राज्यों की चिंता क्यों बढ़ी?
दक्षिण भारत के कई राज्यों ने पिछले कई दशकों में जनसंख्या नियंत्रण की नीति को सफलतापूर्वक लागू किया है।
यदि भविष्य में केवल जनसंख्या के आधार पर लोकसभा सीटों का पुनर्वितरण होता है, तो उत्तर भारत के राज्यों की सीटें काफी बढ़ सकती हैं जबकि दक्षिणी राज्यों का प्रतिनिधित्व अपेक्षाकृत कम हो सकता है।
यही कारण है कि तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक और तेलंगाना जैसे राज्यों में परिसीमन को लेकर पहले से चिंता जताई जाती रही है।
Supriya Sule ने भी इसी चिंता को सामने रखते हुए सरकार से स्पष्ट आश्वासन देने की मांग की है।
महाराष्ट्र का उदाहरण देकर समझाया पूरा मामला
Supriya Sule ने महाराष्ट्र का उदाहरण देते हुए कहा कि यदि सभी राज्यों में 50 प्रतिशत सीटें बढ़ती हैं तो महाराष्ट्र की लोकसभा सीटें 48 से बढ़कर लगभग 72 हो जाएंगी।
लेकिन इसके बाद अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटें तय होंगी।
इसके बाद महिलाओं के लिए आरक्षण लागू होगा।
ऐसी स्थिति में सामान्य वर्ग की सीटों की संख्या किस प्रकार तय होगी, इसका स्पष्ट फार्मूला सरकार को बताना चाहिए।
उन्होंने कहा कि केवल घोषणा करना पर्याप्त नहीं होगा बल्कि विधेयक में इसका स्पष्ट उल्लेख होना चाहिए।
क्या भाजपा के लिए आसान हो सकता है रास्ता?
कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि Supriya Sule ने सरकार के सामने ऐसी शर्त रखी है जिसे स्वीकार करना भाजपा के लिए बहुत कठिन नहीं होगा।
विश्लेषकों का कहना है कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पहले भी सार्वजनिक रूप से सभी राज्यों में 50 प्रतिशत सीटें बढ़ाने की बात कह चुके हैं।
हालांकि विधेयक के मसौदे में इसका स्पष्ट उल्लेख नहीं था।
यदि सरकार इस प्रावधान को लिखित रूप में जोड़ देती है तो विपक्ष के कुछ दलों का समर्थन मिल सकता है।
राजनीतिक विश्लेषकों की राय
राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि असली मुद्दा केवल सीटों की संख्या नहीं बल्कि परिसीमन आयोग की कार्यप्रणाली भी है।
यह भी सवाल उठाया जा रहा है कि परिसीमन आयोग का अध्यक्ष कौन होगा और निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्गठन किन मानकों के आधार पर किया जाएगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इन बिंदुओं पर पारदर्शिता नहीं रखी गई तो भविष्य में नए विवाद खड़े हो सकते हैं।
विपक्ष में क्यों बढ़ी बेचैनी?
Supriya Sule के बयान के बाद विपक्षी गठबंधन इंडिया ब्लॉक के भीतर भी नई चर्चाएं शुरू हो गई हैं।
कांग्रेस पहले ही परिसीमन विधेयक का विरोध कर रही है।
दूसरी ओर कुछ क्षेत्रीय दल इस मुद्दे पर अलग राय रखते हैं।
यदि एनसीपी (शरद पवार) भविष्य में सरकार का समर्थन करती है तो विपक्ष की एकजुटता पर बड़ा असर पड़ सकता है।
इसी वजह से राजनीतिक हलकों में Supriya Sule का यह बयान आगामी संसद सत्र का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाक्रम माना जा रहा है।
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