बिहार में सरकारी भूमि के दाखिल-खारिज और जमाबंदी से जुड़ी प्रक्रियाओं में अंचल स्तर पर बरती जा रही गंभीर शिथिलता एक बार फिर सुर्खियों में है। Bihar bhumi News के अनुसार, राजस्व एवं भूमि सुधार व्यवस्था की जमीनी हकीकत यह है कि राज्यभर में हजारों आवेदन महीनों से लंबित हैं, जिनका समयबद्ध निष्पादन होना चाहिए था। यह स्थिति न केवल प्रशासनिक सुस्ती को उजागर करती है, बल्कि सरकारी भूमि की सुरक्षा, राजस्व संरक्षण और अभिलेखों की शुद्धता पर भी बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा करती है।
अंचल स्तर पर लापरवाही का गंभीर मुद्दा
बिहार में भूमि प्रशासन की सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दाखिल-खारिज और जमाबंदी की प्रक्रिया मानी जाती है। निजी भूमि के मामलों में देरी एक पुरानी समस्या रही है, लेकिन अब सरकारी भूमि के मामलों में भी वही ढिलाई देखी जा रही है। Bihar bhumi News के जरिए सामने आई जानकारी बताती है कि कई अंचलों में तो एक भी आवेदन का निष्पादन नहीं किया गया, जबकि आवेदन 90 दिनों से अधिक समय से लंबित हैं। यह लापरवाही ऐसे समय में सामने आई है, जब राज्य सरकार अवैध कब्जों और भूमि घोटालों पर सख्ती के दावे कर रही है।
सचिव की आपत्ति और प्रशासनिक चिंता
राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग के सचिव ने इस स्थिति पर कड़ी आपत्ति जताई है। राज्य स्तर पर की गई समीक्षा में यह तथ्य सामने आया कि केवल 22.86 प्रतिशत आवेदनों का ही निष्पादन हो सका है। Bihar bhumi News में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक, सचिव ने इसे “अत्यंत चिंताजनक” बताते हुए सभी जिलाधिकारियों (समाहर्ताओं) को अंचलवार लंबित मामलों की सूची भेजी है और नियमित मॉनिटरिंग के निर्देश दिए हैं।
सचिव का स्पष्ट मानना है कि सरकारी भूमि के मामलों में लापरवाही का सीधा लाभ अवैध तत्वों को मिलता है, जो फर्जी दस्तावेजों के माध्यम से भूमि की खरीद-बिक्री तक कर डालते हैं। इससे न केवल सरकारी संपत्ति को नुकसान होता है, बल्कि बाद में कानूनी विवाद और प्रशासनिक संकट भी बढ़ता है।
10 हजार से अधिक मामले लंबित
राज्यभर की स्थिति देखें तो Bihar bhumi News के आंकड़े बताते हैं कि 10 हजार से अधिक दाखिल-खारिज और जमाबंदी से जुड़े मामले अंचल स्तर पर लंबित हैं। कुछ अंचलों में स्थिति इतनी खराब है कि एक भी आवेदन का निपटारा नहीं हुआ। इससे यह स्पष्ट होता है कि समस्या किसी एक जिले या क्षेत्र तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे राज्य में फैली हुई है।
इसका सबसे बड़ा असर यह है कि सरकारी भूमि का रिकॉर्ड अद्यतन नहीं हो पा रहा। जब रिकॉर्ड में देरी होती है, तो जमीन की वास्तविक स्थिति अस्पष्ट बनी रहती है, जिसका फायदा भूमाफिया और अवैध खरीदार उठाते हैं।
मुजफ्फरपुर की स्थिति
मुजफ्फरपुर जिले की बात करें तो यहां भी हालात संतोषजनक नहीं हैं। Bihar bhumi News के अनुसार, जिले में 188 मामलों में सरकारी भूमि के दाखिल-खारिज और जमाबंदी की प्रक्रिया लंबित है। इनमें से कई मामले तीन-तीन महीने से अधिक समय से अटके हुए हैं।
बोचहां, गायघाट और मड़वन जैसे अंचलों में तो एक भी आवेदन का निष्पादन नहीं किया गया। वहीं मोतीपुर अंचल में स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर रही, जहां लगभग 80 प्रतिशत मामलों का निपटारा किया गया। यह अंतर बताता है कि समस्या संसाधनों की नहीं, बल्कि कार्यशैली और इच्छाशक्ति की है।
अंचलवार आंकड़े क्या कहते हैं
जिले के अंचलवार आंकड़े प्रशासनिक निष्क्रियता को साफ तौर पर उजागर करते हैं। Bihar bhumi News में दिए गए विवरण के अनुसार:
बोचहां: 33 आवेदन, 33 लंबित, 0 निष्पादित
गायघाट: 17 आवेदन, 17 लंबित, 0 निष्पादित
कांटी: 9 आवेदन, 5 लंबित, 4 निष्पादित
मड़वन: 4 आवेदन, 4 लंबित, 0 निष्पादित
मीनापुर: 5 आवेदन, 5 लंबित, 0 निष्पादित
मोतीपुर: 10 आवेदन, 1 लंबित, 8 निष्पादित
मुशहरी: 16 आवेदन, 10 लंबित, 6 निष्पादित
पारू: 38 आवेदन, 23 लंबित, 15 निष्पादित
सरैया: 56 आवेदन, 38 लंबित, 12 निष्पादित
ये आंकड़े दिखाते हैं कि कुछ अंचल जहां बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं, वहीं कई अंचलों में पूर्ण निष्क्रियता है।
सत्यापन कार्य बनाम निष्पादन में सुस्ती
एक तरफ जिले और राज्य में सरकारी भूमि का सत्यापन अभियान चलाया जा रहा है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि कहां-कहां अतिक्रमण या अवैध कब्जा है। दूसरी तरफ दाखिल-खारिज और जमाबंदी की प्रक्रिया में ही देरी हो रही है। Bihar bhumi News के अनुसार, जब तक रिकॉर्ड अपडेट नहीं होंगे, तब तक सत्यापन का उद्देश्य भी अधूरा रह जाएगा।
सरकारी भूमि को संबंधित विभाग या राष्ट्रपति के नाम दर्ज करने में भी अंचल स्तर पर सुस्ती देखी जा रही है। यह प्रशासनिक विरोधाभास है, जो सुधार की मांग करता है।
अवैध बिक्री के पुराने मामले
बिहार में पहले भी सरकारी भूमि की अवैध बिक्री और फर्जी दाखिल-खारिज के मामले सामने आ चुके हैं। Bihar bhumi News में उल्लेखित कांटी का मामला इसका बड़ा उदाहरण है, जहां कृषि विभाग की जमीन बेच दी गई थी और तत्कालीन अंचलाधिकारी ने उसका दाखिल-खारिज भी कर दिया। मामला उजागर होने पर अधिकारी को निलंबित किया गया और जमाबंदी रद्द कर पुनः कृषि विभाग के नाम दर्ज की गई।
इसी तरह रामदयालु क्षेत्र में एनएचएआई की जमीन को अवैध तरीके से बेचने, दाखिल-खारिज करने और जमाबंदी कराने का मामला सामने आया था। इन घटनाओं से स्पष्ट है कि यदि समय पर कार्रवाई न हो, तो सरकारी संपत्ति को भारी नुकसान हो सकता है।
सचिव के निर्देश और अपेक्षाएं
इन मामलों को देखते हुए सचिव ने सख्त निर्देश जारी किए हैं। Bihar bhumi News के मुताबिक, सभी समाहर्ताओं को नियमित समीक्षा, अंचलवार निगरानी और समयसीमा के भीतर निष्पादन सुनिश्चित करने को कहा गया है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि सरकारी हित और राजस्व संरक्षण सर्वोच्च प्राथमिकता है, और इसमें किसी भी प्रकार की ढिलाई स्वीकार्य नहीं होगी।
जनता और प्रशासन के लिए संदेश
यह पूरा मामला प्रशासन और जनता दोनों के लिए एक चेतावनी है। Bihar bhumi News बार-बार यह रेखांकित कर रहा है कि सरकारी भूमि केवल कागजों पर नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर भी सुरक्षित होनी चाहिए। जब रिकॉर्ड समय पर अपडेट होंगे, तभी अवैध कब्जों पर प्रभावी रोक लगाई जा सकेगी।
निष्कर्ष
अंततः, बिहार में सरकारी भूमि के दाखिल-खारिज और जमाबंदी में अंचल स्तर की शिथिलता एक गंभीर प्रशासनिक चुनौती है। Bihar bhumi News के माध्यम से सामने आई यह रिपोर्ट दर्शाती है कि सुधार की आवश्यकता केवल निर्देशों तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि कड़ाई से अमल और जवाबदेही तय करनी होगी। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह समस्या और गहराती जाएगी, जिसका खामियाजा राज्य की सार्वजनिक संपत्ति और आम जनता दोनों को भुगतना पड़ेगा।
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