Allahabad High Court का सख्त वार: 1 बड़े आरोपी को झटका

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Allahabad High Court (Lucknow Bench) ने शुक्रवार को एक व्यक्ति को anticipatory bail (अग्रिम जमानत) देने से इनकार कर दिया। उस व्यक्ति पर आरोप था कि वह एक सिंडिकेट का “मुख्य सरगना” था, जो बांग्लादेशी, रोहिंग्या और अन्य राष्ट्र विरोधी व्यक्तियों को भारत में बसने और अव्यवस्था व असहमति पैदा करने में मदद करता था। न्यायमूर्ति राजेश सिंह चौहान और न्यायमूर्ति प्रमोद कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच एजेंसी के “लापरवाह और अयोग्य दृष्टिकोण” पर गहरा असंतोष व्यक्त किया।

Allahabad High Court: मामले की संक्षिप्त जानकारी

अपीलकर्ता (डॉ. अब्दुल गफ्फार) ने Allahabad High Court में एक याचिका दायर की थी, जिसमें उन्होंने विशेष न्यायाधीश, एनआईए/अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, लखनऊ द्वारा नवंबर 2025 में उनके अग्रिम जमानत आवेदन को खारिज किए जाने के आदेश को चुनौती दी थी। यह मामला भारतीय दंड संहिता (IPC) की कड़ी धाराओं 120-B (साजिश), 370 (मानव तस्करी), विदेशी अधिनियम और पासपोर्ट अधिनियम के तहत दर्ज किया गया था। आरोप है कि आरोपी ने कई खातों को खोलकर अवैध रूप से धन प्राप्त किया और हवाला लेन-देन के जरिए घुसपैठियों और अनधिकृत व्यक्तियों की सहायता की, जो राष्ट्र विरोधी गतिविधियों में लिप्त थे।

Allahabad High Court: अदालत की टिप्पणियाँ:
सुनवाई के दौरान, Allahabad High Court की खंडपीठ ने सबसे पहले जांच अधिकारी (IO) के द्वारा अपीलकर्ता के कार्यालय परिसर में छापेमारी के लिए कोई खोज वारंट न लेने की निंदा की। अदालत ने यह सवाल उठाया कि जब आईओ ने आरोपी के आवासीय परिसर का दौरा किया था, तो कार्यालय परिसर की तलाशी क्यों नहीं ली गई। इस कुप्रबंधन के कारण अदालत ने पुलिस की कार्यशैली पर कड़ी टिप्पणी की और कहा कि यह दर्शाता है कि जांच अधिकारी आरोपी के खिलाफ कोई ठोस सबूत इकट्ठा नहीं कर पाए।

Allahabad High Court: अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि भले ही आरोपी के खिलाफ दो बार गैर-जमानती वारंट जारी किए गए थे और क्रिमिनल प्रोसिजर कोड (CrPC) के तहत सेक्शन 82/83 के तहत एक उद्घोषणा आदेश जारी किया गया था, लेकिन उच्च न्यायालय ने उसे निरस्त कर दिया और मामले को विशेष न्यायाधीश, एनआईए/एसएएसजे-3, लखनऊ को वापस भेज दिया ताकि वह कानून के अनुसार नया आदेश पारित करें। अदालत ने यह भी कहा कि चूंकि आरोपी के खिलाफ कोई वैध कदम नहीं उठाए गए हैं, इसलिए उसकी कस्टोडियल पूछताछ की आवश्यकता नहीं है।

राज्य के वकील एसएन तिलहरी का तर्क:
राज्य के वकील एसएन तिलहरी ने प्रतिवाद करते हुए कहा कि भले ही उच्च न्यायालय ने उद्घोषणा आदेश को निरस्त कर दिया, लेकिन आरोपी को बिना किसी वारंट के गिरफ्तार किया जा सकता है, क्योंकि आरोप गंभीर हैं और वह अपराध के लिए दोषी है।

पुलिस की भूमिका और जांच:
अदालत ने यह भी सवाल किया कि पुलिस अधिकारी ने क्यों आरोपी के कार्यालय के परिसर में बिना खोज वारंट के कोई कार्रवाई नहीं की। कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि इस प्रकार के कृत्य न्यायसंगत और उचित जांच प्रक्रिया के खिलाफ हैं। अदालत ने जांच अधिकारी से पूछा कि क्यों उसने आरोपी के खिलाफ कोई ठोस कदम नहीं उठाया, जबकि इस मामले में गंभीर आरोप थे।

Allahabad High Court: न्यायालय के निर्देश:
अदालत ने इस मामले की गंभीरता को ध्यान में रखते हुए जांच एजेंसी से उचित कार्रवाई करने की उम्मीद जताई। अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि इस मामले में अगली सुनवाई 21 जनवरी 2026 को होगी, जब और सबूतों के आधार पर कार्रवाई की जाएगी। इस पर भी अदालत ने स्पष्ट किया कि आरोपी के खिलाफ जो भी आरोप लगे हैं, उनका साक्ष्य जल्दी से जल्दी प्रस्तुत किया जाए।

निष्कर्ष:
Allahabad High Court ने अपनी कड़ी टिप्पणियों के जरिए जांच अधिकारी की नाकामियों को उजागर किया और मामले की सही तरीके से जांच करने के लिए जांच एजेंसी को दिशा निर्देश दिए। अदालत ने जमानत आवेदन को खारिज करते हुए मामले को और गहराई से देखने की आवश्यकता जताई है। इस मामले से यह भी साबित हुआ कि जांच अधिकारियों को अपनी जिम्मेदारी निभाने के लिए कड़ी जवाबदेही का सामना करना पड़ेगा, ताकि न्याय सुनिश्चित किया जा सके।

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