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Snana Purnima के 7 बड़े अपडेट, पुरी में भगवान जगन्नाथ के दिव्य स्नान की भव्य तैयारी शुरू

Snana Purnima

Snana Purnima 2026: पुरी में भगवान जगन्नाथ के दिव्य स्नान महोत्सव की तैयारियां पूरी, रथ यात्रा से पहले होगा भव्य आयोजन

ओडिशा के पुरी में स्थित श्रीजगन्नाथ मंदिर एक बार फिर भक्ति और आस्था के रंग में रंगने जा रहा है। Snana Purnima के पावन अवसर पर भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा का दिव्य स्नान महोत्सव (देब स्नान पूर्णिमा) 29 जून 2026 को पूरे वैदिक विधि-विधान के साथ आयोजित किया जाएगा। यह पर्व विश्व प्रसिद्ध रथ यात्रा से लगभग 15 दिन पहले मनाया जाता है और इसे जगन्नाथ संस्कृति का सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक अनुष्ठानों में से एक माना जाता है।

इस वर्ष Snana Purnima को लेकर श्रीजगन्नाथ मंदिर प्रशासन (SJTA), ओडिशा सरकार और पुलिस प्रशासन ने व्यापक तैयारियां की हैं। लाखों श्रद्धालुओं के पुरी पहुंचने की संभावना को देखते हुए सुरक्षा, यातायात और दर्शन व्यवस्था को विशेष रूप से मजबूत किया गया है।

क्या है Snana Purnima?

Snana Purnima ज्येष्ठ माह की पूर्णिमा तिथि पर मनाया जाने वाला विशेष पर्व है। इसी दिन भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा वर्ष में पहली बार गर्भगृह से बाहर निकलकर श्रद्धालुओं को दर्शन देते हैं।

इसी कारण इसे भगवान के “प्रथम सार्वजनिक दर्शन” का पर्व भी कहा जाता है।

रथ यात्रा से पहले क्यों महत्वपूर्ण है Snana Purnima?

Snana Purnima को रथ यात्रा की शुरुआत का आध्यात्मिक आधार माना जाता है। इस दिन दिव्य स्नान के बाद भगवान 15 दिनों तक ‘अनासार’ काल में विश्राम करते हैं और फिर ‘नवयौवन दर्शन’ के बाद रथ यात्रा में भक्तों को दर्शन देते हैं।

सुबह से शुरू होंगे 23 प्रमुख अनुष्ठान

Snana Purnima के अवसर पर मंदिर में लगभग 23 प्रमुख धार्मिक अनुष्ठान संपन्न होंगे।

मुख्य अनुष्ठानों में शामिल हैं—

इन सभी अनुष्ठानों का पालन सदियों पुरानी परंपरा के अनुसार किया जाता है।

108 कलशों से होगा दिव्य स्नान

Snana Purnima का सबसे प्रमुख अनुष्ठान भगवान का महाभिषेक है।

भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा का स्नान 108 पवित्र कलशों के जल से किया जाएगा।

यह जल मंदिर परिसर के पवित्र “सुना कुआं” से लाया जाता है।

जल में—

सम्मिलित किया जाता है।

हिंदू धर्म में 108 संख्या पूर्णता और दिव्यता का प्रतीक मानी जाती है।

हाथी वेश (Hati Besha) का धार्मिक महत्व

दिव्य स्नान के बाद भगवान जगन्नाथ और भगवान बलभद्र को हाथी वेश (गज वेश) में सजाया जाता है।

देवी सुभद्रा को विशेष कमल श्रृंगार से अलंकृत किया जाता है।

Snana Purnima के दौरान हाथी वेश देखने के लिए लाखों श्रद्धालु पुरी पहुंचते हैं।

हाथी वेश की पौराणिक कथा

मान्यता है कि 15वीं शताब्दी में भगवान गणेश के भक्त पंडित गणपति भट्ट पुरी पहुंचे थे।

उनकी इच्छा पूरी करने के लिए भगवान जगन्नाथ और बलभद्र ने गणेश स्वरूप धारण किया।

तभी से Snana Purnima के अवसर पर हाथी वेश धारण करने की परंपरा चली आ रही है।

स्नान के बाद भगवान क्यों हो जाते हैं बीमार?

मंदिर की परंपरा के अनुसार दिव्य स्नान के बाद भगवान को ज्वर (दिव्य बुखार) हो जाता है।

इसी कारण उन्हें लगभग 15 दिनों तक ‘अनासार गृह’ में विश्राम कराया जाता है।

इस अवधि में भक्त सीधे भगवान के दर्शन नहीं कर पाते।

अनासार काल क्या है?

Snana Purnima के बाद शुरू होने वाला अनासार काल लगभग 15 दिनों तक चलता है।

इस दौरान भगवान को आयुर्वेदिक औषधियां अर्पित की जाती हैं।

श्रद्धालु इस अवधि में ‘पट्टी दियान’ स्वरूप भगवान के दर्शन करते हैं।

नवयौवन दर्शन

अनासार समाप्त होने के बाद भगवान पुनः भक्तों के सामने आते हैं।

इसे ‘नवयौवन दर्शन’ कहा जाता है।

इसके अगले दिन विश्व प्रसिद्ध रथ यात्रा का शुभारंभ होता है।

पुरी में सुरक्षा के कड़े इंतजाम

Snana Purnima को देखते हुए प्रशासन ने अभूतपूर्व सुरक्षा व्यवस्था की है।

मुख्य व्यवस्थाएं—

श्रद्धालुओं के लिए विशेष व्यवस्था

श्रद्धालुओं को सिंहद्वार से प्रवेश दिया जाएगा।

अनुष्ठान पूरे होने तक सामान्य दर्शन दोपहर लगभग 2 बजे तक बंद रहेंगे।

इसके बाद चरणबद्ध तरीके से श्रद्धालुओं को दर्शन कराए जाएंगे।

प्रशासन ने क्या कहा?

श्रीजगन्नाथ मंदिर प्रशासन के मुख्य प्रशासक ने बताया कि सभी सेवायत समय पर सभी अनुष्ठान संपन्न करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

उन्होंने श्रद्धालुओं से प्रशासन के निर्देशों का पालन करने की अपील भी की।

धार्मिक महत्व

Snana Purnima केवल स्नान उत्सव नहीं बल्कि—

का प्रतीक माना जाता है।

यही पर्व भगवान जगन्नाथ की वार्षिक रथ यात्रा का आधिकारिक आरंभ भी माना जाता है।

निष्कर्ष

Snana Purnima जगन्नाथ संस्कृति का अत्यंत महत्वपूर्ण और पवित्र पर्व है। 29 जून 2026 को पुरी में आयोजित होने वाला यह दिव्य स्नान महोत्सव न केवल लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बनेगा, बल्कि आगामी रथ यात्रा की आध्यात्मिक शुरुआत भी करेगा। 108 कलशों से महाभिषेक, हाथी वेश, अनासार काल और नवयौवन दर्शन जैसी परंपराएं इस उत्सव को अद्वितीय बनाती हैं। प्रशासन ने सुरक्षा और भीड़ प्रबंधन के व्यापक इंतजाम किए हैं ताकि सभी श्रद्धालु शांतिपूर्वक भगवान के दर्शन कर सकें।

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