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NCLT President की शक्ति पर बड़ा सवाल, SC करेगा ऐतिहासिक फैसला?

NCLT President

ArcelorMittal केस और NCLT ट्रांसफर विवाद: सुप्रीम कोर्ट ने उठाए अहम सवाल

भारत की न्यायिक व्यवस्था में ट्रिब्यूनलों की भूमिका लगातार बढ़ती जा रही है। ऐसे में हाल ही में सामने आया ArcelorMittal Nippon Steel India Limited से जुड़ा विवाद न केवल कानूनी हलकों में बल्कि कॉरपोरेट जगत में भी गहरी चर्चा का विषय बन गया है। इस पूरे मामले के केंद्र में है—NCLT President की वह शक्ति, जिसके तहत किसी केस को एक बेंच से दूसरी बेंच में ट्रांसफर किया जा सकता है।

इस विवाद ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण (NCLT) के अध्यक्ष को राज्यों की सीमाओं के बाहर केस ट्रांसफर करने का अधिकार है या नहीं।


विवाद की शुरुआत कैसे हुई?

यह पूरा मामला तब शुरू हुआ जब अहमदाबाद स्थित NCLT की दो बेंचों ने ArcelorMittal से जुड़े मामलों की सुनवाई से खुद को अलग (recuse) कर लिया। इसके बाद NCLT President ने एक प्रशासनिक आदेश जारी करते हुए इन मामलों को अहमदाबाद से मुंबई ट्रांसफर कर दिया।

यह फैसला आगे चलकर एक बड़े संवैधानिक और कानूनी विवाद में तब्दील हो गया।


NCLT Rules 2016 का Rule 16(d) क्या कहता है?

NCLT नियम, 2016 का Rule 16(d) स्पष्ट करता है कि NCLT का अध्यक्ष “जरूरत पड़ने पर किसी भी केस को एक बेंच से दूसरी बेंच में ट्रांसफर कर सकता है।” इसी नियम के तहत NCLT President ने अहमदाबाद से मुंबई ट्रांसफर का आदेश दिया था।

हालांकि, इसी बिंदु पर गुजरात हाईकोर्ट ने अलग दृष्टिकोण अपनाया।


गुजरात हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

गुजरात हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि NCLT President की ट्रांसफर पावर केवल उसी राज्य के भीतर लागू होती है। अदालत के अनुसार, केंद्र सरकार द्वारा तय की गई क्षेत्रीय सीमा को अध्यक्ष बदल नहीं सकता।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि केस को एक राज्य से दूसरे राज्य में ट्रांसफर करना “क्षेत्राधिकार का विस्तार” (extension of territorial jurisdiction) माना जाएगा, जो स्वीकार्य नहीं है।


हाईकोर्ट ने क्या आदेश दिया?

गुजरात हाईकोर्ट ने:

  1. NCLT की सभी पांच विवादित ट्रांसफर और recusal आदेशों को रद्द कर दिया

  2. NCLT President को निर्देश दिया कि वह मामलों को अहमदाबाद की किसी अन्य बेंच को पुनः आवंटित करें

  3. यदि जरूरी हो, तो वर्चुअल बेंच गठित करने का सुझाव भी दिया

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि बार-बार recusal से न्यायिक प्रक्रिया बाधित होती है।


“Recusal कमजोरी नहीं होनी चाहिए” – हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी

अपने फैसले में गुजरात हाईकोर्ट ने बेहद सख्त शब्दों का प्रयोग करते हुए कहा कि:

“जब कोई पक्ष न्यायिक अधिकारियों को धमकाने या दबाव बनाने की कोशिश करता है, तब recusal समाधान नहीं है। ऐसे मामलों में सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।”

हाईकोर्ट के अनुसार, न्यायिक उदारता को कमजोरी नहीं समझा जाना चाहिए।


सुप्रीम कोर्ट की एंट्री और बड़ा सवाल

मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने गुजरात हाईकोर्ट की व्याख्या पर prima facie doubt जताया।

सुप्रीम कोर्ट ने यह अहम सवाल उठाया:

“अगर किसी स्थान पर सिर्फ एक ही NCLT बेंच हो और उसका सदस्य किसी कारणवश recuse कर ले, तो फिर सुनवाई कैसे होगी?”

इस संदर्भ में अदालत ने माना कि कई बार राज्य के बाहर ट्रांसफर ही एकमात्र व्यावहारिक समाधान हो सकता है।


सुप्रीम कोर्ट का काल्पनिक उदाहरण

पीठ ने उदाहरण देते हुए कहा:

“मान लीजिए अहमदाबाद में सिर्फ एक बेंच है और हितों के टकराव के कारण सदस्य को recuse करना पड़े। तब क्या केस हमेशा वहीं अटका रहेगा? उसे A, B या C किसी अन्य स्थान पर भेजना ही पड़ेगा।”

इस तर्क ने NCLT President की ट्रांसफर शक्ति को लेकर बहस को और गहरा कर दिया।


सुप्रीम कोर्ट ने Recusal पर क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि:

इस टिप्पणी को NCLT की स्वतंत्रता के रूप में देखा जा रहा है।


“हाईकोर्ट को ट्रिब्यूनल की शक्तियां सीमित करने का क्या अधिकार?” – सुप्रीम कोर्ट

सुनवाई के दौरान पीठ ने एक तीखा सवाल भी पूछा:

“हाईकोर्ट को ट्रिब्यूनल की शक्तियों को इस तरह सीमित करने का क्या अधिकार है?”

यह सवाल भारतीय न्याय प्रणाली में ट्रिब्यूनल और हाईकोर्ट के अधिकारों के संतुलन को लेकर बेहद अहम माना जा रहा है।


ArcelorMittal का पक्ष क्या है?

ArcelorMittal ने आरोप लगाया कि:

कंपनी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल ने सुप्रीम कोर्ट में दलीलें पेश कीं।


NCLT ट्रांसफर पावर पर बड़ा असर

इस पूरे विवाद का सीधा असर NCLT President की प्रशासनिक शक्तियों पर पड़ेगा। सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला यह तय कर सकता है कि:


कॉरपोरेट सेक्टर के लिए क्यों अहम है यह मामला?

कॉरपोरेट कानून से जुड़े मामलों में NCLT की भूमिका बेहद अहम है। यदि केस ट्रांसफर को लेकर अस्पष्टता बनी रहती है, तो इससे:

जैसी समस्याएं पैदा हो सकती हैं।


आगे क्या?

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई की तारीख 23 फरवरी 2026 तय की है। माना जा रहा है कि इस दिन अदालत कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश दे सकती है, जिससे NCLT President की शक्तियों को लेकर स्थायी समाधान निकल सके।


निष्कर्ष

ArcelorMittal से जुड़ा यह विवाद केवल एक कंपनी तक सीमित नहीं है। यह भारतीय न्यायिक ढांचे, ट्रिब्यूनल की स्वतंत्रता और NCLT President की प्रशासनिक भूमिका पर गहरे सवाल खड़े करता है।

सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला न केवल NCLT बल्कि देश के सभी अर्ध-न्यायिक संस्थानों के कामकाज की दिशा तय करेगा। आने वाला फैसला यह स्पष्ट करेगा कि न्याय की गति बनाए रखने के लिए ट्रांसफर पावर कितनी जरूरी है और उसकी सीमाएं क्या होनी चाहिए।

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