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Laboratory Facility: IIT बॉम्बे की नंबर 1 ऐतिहासिक ग्रीन क्रांति!

Laboratory Facility

भारत को मिली बड़ी सफलता! IIT बॉम्बे में शुरू हुई पहली अत्याधुनिक Laboratory Facility

भारत ने जलवायु परिवर्तन और कार्बन उत्सर्जन से निपटने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम उठाया है। केंद्रीय शिक्षा मंत्री Dharmendra Pradhan ने IIT बॉम्बे में देश की पहली Integrated CCUS Laboratory Facility का उद्घाटन किया। यह परियोजना भारत इनोवेट्स 2026 कार्यक्रम के तहत शुरू की गई है और इसे भारत की जलवायु रणनीति तथा आत्मनिर्भर भारत मिशन के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

यह नई Laboratory Facility न केवल भारत की तकनीकी क्षमता को दुनिया के सामने प्रदर्शित करती है, बल्कि यह देश को Net-Zero Emission लक्ष्य हासिल करने की दिशा में भी मजबूती प्रदान करेगी। IIT बॉम्बे द्वारा विकसित यह सुविधा कार्बन कैप्चर, उपयोग और स्थायी भंडारण यानी Carbon Capture, Utilisation and Storage (CCUS) तकनीक पर आधारित है। विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले वर्षों में यह तकनीक उद्योगों से निकलने वाले कार्बन उत्सर्जन को कम करने में क्रांतिकारी भूमिका निभा सकती है।

क्या है यह नई Laboratory Facility?

IIT बॉम्बे में स्थापित यह Integrated CCUS Laboratory Facility भारत की पहली ऐसी पायलट-स्केल परियोजना है, जो कार्बन डाइऑक्साइड को पकड़ने, उसका उपयोग करने और उसे स्थायी रूप से सुरक्षित भू-स्तरों में संग्रहित करने की क्षमता रखती है।

यह Laboratory Facility कई आधुनिक तकनीकों का संगम है। इसमें वातावरण और उद्योगों से निकलने वाली CO₂ गैस को विशेष तकनीक के जरिए कैप्चर किया जाएगा। इसके बाद उसे औद्योगिक उपयोग में आने वाले कार्बोनेट और बाइकार्बोनेट साल्ट में बदला जाएगा। साथ ही अतिरिक्त CO₂ को भूगर्भीय संरचनाओं में सुरक्षित रूप से संग्रहित किया जाएगा।

विशेष बात यह है कि इस पूरी प्रक्रिया में गैर-पीने योग्य पानी का इस्तेमाल किया जाएगा, जिससे जल संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव नहीं पड़ेगा। यही कारण है कि यह Laboratory Facility पर्यावरण संरक्षण और संसाधनों के संतुलित उपयोग का शानदार उदाहरण मानी जा रही है।

भारत के लिए क्यों खास है यह Laboratory Facility?

भारत दुनिया के सबसे तेजी से विकसित हो रहे देशों में शामिल है। विकास के साथ-साथ ऊर्जा की मांग और औद्योगिक गतिविधियां भी बढ़ रही हैं। ऐसे में कार्बन उत्सर्जन को नियंत्रित करना बड़ी चुनौती बन गया है।

नई Laboratory Facility इस चुनौती का समाधान देने की क्षमता रखती है। यह सुविधा भारत को स्वदेशी कार्बन प्रबंधन तकनीक विकसित करने में मदद करेगी। इससे विदेशी तकनीकों पर निर्भरता कम होगी और “आत्मनिर्भर भारत” मिशन को नई ताकत मिलेगी।

विशेषज्ञों के अनुसार, यदि इस तकनीक को बड़े स्तर पर लागू किया गया तो आने वाले समय में भारत अपने औद्योगिक कार्बन उत्सर्जन को काफी हद तक कम कर सकता है।

शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने क्या कहा?

उद्घाटन समारोह में केंद्रीय शिक्षा मंत्री Dharmendra Pradhan ने कहा कि यह दिन भारत की सतत विकास यात्रा में एक महत्वपूर्ण शुरुआत है।

उन्होंने कहा कि IIT बॉम्बे जैसे संस्थान अब केवल शिक्षा तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे वैश्विक समस्याओं के समाधान भी तैयार कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि यह Integrated CCUS Laboratory Facility राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 की भावना को साकार करती है, जहां शिक्षा, उद्योग, नीति और समाज एक साथ मिलकर काम कर रहे हैं।

धर्मेंद्र प्रधान ने यह भी कहा कि भारत को भविष्य की चुनौतियों से निपटने के लिए ऐसी ही इनोवेटिव तकनीकों की जरूरत है।

Vineet Joshi ने बताया भविष्य का रोडमैप

उच्च शिक्षा विभाग के सचिव Vineet Joshi ने कहा कि IIT बॉम्बे की यह पहल देश के अन्य संस्थानों के लिए भी प्रेरणा बनेगी।

उन्होंने कहा कि यह Laboratory Facility दिखाती है कि कैसे शिक्षा संस्थान, उद्योग और सरकार मिलकर जलवायु परिवर्तन जैसी वैश्विक चुनौती का समाधान तैयार कर सकते हैं। उनके अनुसार यह परियोजना विकसित भारत 2047 के लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में बड़ा कदम है।

IIT बॉम्बे की बड़ी उपलब्धि

Indian Institute of Technology Bombay लंबे समय से वैज्ञानिक अनुसंधान और तकनीकी नवाचार के लिए जाना जाता है। अब यह संस्थान कार्बन प्रबंधन तकनीक के क्षेत्र में भी अग्रणी बन गया है।

इस Laboratory Facility का नेतृत्व प्रोफेसर विक्रम विशाल कर रहे हैं। उनके नेतृत्व में वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं की टीम ने इस परियोजना को विकसित किया।

यह परियोजना केवल एक प्रयोगशाला नहीं बल्कि एक राष्ट्रीय परीक्षण मंच भी है, जहां भविष्य की कार्बन प्रबंधन तकनीकों का परीक्षण और विकास किया जाएगा।

UrjanovaC स्टार्टअप की अहम भूमिका

इस Integrated CCUS Laboratory Facility को आगे बढ़ाने में UrjanovaC नामक डीप-टेक स्टार्टअप की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। यह स्टार्टअप IIT बॉम्बे के SINE (Society for Innovation & Entrepreneurship) के अंतर्गत विकसित किया गया है।

इस स्टार्टअप की स्थापना प्रोफेसर विक्रम विशाल और प्रोफेसर अर्नब दत्ता ने की है। Bharat Innovates 2026 में इसे भारत के प्रमुख स्टार्टअप्स में शामिल किया गया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्टार्टअप भविष्य में कार्बन कैप्चर तकनीकों को उद्योगों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण योगदान देगा।

कैसे काम करेगी यह Laboratory Facility?

नई Laboratory Facility मुख्य रूप से तीन चरणों में काम करेगी:

1. Carbon Capture

सबसे पहले उद्योगों और वातावरण से निकलने वाली CO₂ गैस को विशेष तकनीक से कैप्चर किया जाएगा।

2. Carbon Utilisation

कैप्चर की गई गैस को औद्योगिक उपयोग के लिए उपयोगी उत्पादों में बदला जाएगा, जैसे कार्बोनेट और बाइकार्बोनेट साल्ट।

3. Geological Storage

बची हुई CO₂ को भूगर्भीय चट्टानों में स्थायी रूप से संग्रहित किया जाएगा ताकि वह वातावरण में वापस न जा सके।

यह पूरी प्रक्रिया भारत की पहली पूर्ण Integrated CCUS Laboratory Facility को बेहद खास बनाती है।

Deccan Traps में होगी CO₂ स्टोरेज

इस परियोजना का एक और महत्वपूर्ण हिस्सा है Deccan Traps में वैज्ञानिक ड्रिलिंग। भारत पहली बार पायलट-स्केल स्तर पर यह जांच करेगा कि क्या इन बेसाल्ट चट्टानों में CO₂ को सुरक्षित रूप से संग्रहित किया जा सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि Deccan Traps दुनिया के सबसे उपयुक्त क्षेत्रों में से एक हो सकता है जहां कार्बन डाइऑक्साइड को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है।

इसलिए यह Laboratory Facility केवल प्रयोगशाला तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत के भूगर्भीय संसाधनों के वैज्ञानिक उपयोग की दिशा में भी बड़ा कदम है।

जलवायु परिवर्तन से लड़ाई में मददगार

आज पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन की चुनौती से जूझ रही है। बढ़ते तापमान, ग्लेशियरों का पिघलना और अनियमित मौसम दुनिया के लिए खतरा बनते जा रहे हैं।

ऐसे समय में यह नई Laboratory Facility भारत को पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में मजबूत स्थिति में ला सकती है। इससे भारत अपने Net-Zero लक्ष्य को हासिल करने के करीब पहुंच सकता है।

विशेषज्ञों के अनुसार, यदि इस तकनीक को बड़े पैमाने पर अपनाया गया तो यह उद्योगों से निकलने वाले लाखों टन CO₂ उत्सर्जन को नियंत्रित कर सकती है।

उद्योगों को क्या होगा फायदा?

इस नई Laboratory Facility का सबसे बड़ा लाभ भारी उद्योगों को मिलेगा। स्टील, सीमेंट, पावर और पेट्रोकेमिकल सेक्टर में कार्बन उत्सर्जन सबसे ज्यादा होता है।

CCUS तकनीक के जरिए ये उद्योग अपने उत्सर्जन को कम कर सकेंगे और अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण मानकों का पालन कर पाएंगे।

इससे भारत की औद्योगिक प्रतिस्पर्धा भी बढ़ेगी और विदेशी निवेशकों का भरोसा मजबूत होगा।

भारत की वैश्विक छवि होगी मजबूत

यह Laboratory Facility भारत को वैश्विक स्तर पर ग्रीन टेक्नोलॉजी लीडर बनाने की दिशा में भी महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।

अब तक ऐसी तकनीकें मुख्य रूप से अमेरिका और यूरोप जैसे देशों में विकसित हो रही थीं। लेकिन अब भारत भी इस क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहा है।

विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले वर्षों में भारत CCUS तकनीक का निर्यातक भी बन सकता है।

National Education Policy 2020 की सफलता

यह परियोजना राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 की सफलता का भी उदाहरण है। नई शिक्षा नीति का उद्देश्य केवल डिग्री प्रदान करना नहीं बल्कि वास्तविक समस्याओं के समाधान तैयार करना है।

IIT बॉम्बे की यह Laboratory Facility दिखाती है कि कैसे शिक्षा संस्थान नवाचार और उद्योग के बीच पुल का काम कर सकते हैं।

भविष्य में क्या होंगे अगले कदम?

अब इस परियोजना का अगला चरण तकनीक को बड़े स्तर पर लागू करना होगा। सरकार और उद्योग मिलकर इसे देश के विभिन्न औद्योगिक क्षेत्रों में लागू करने की योजना बना सकते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अगले 5 से 10 वर्षों में यह तकनीक सफलतापूर्वक लागू हो जाती है तो भारत कार्बन उत्सर्जन नियंत्रण में दुनिया के अग्रणी देशों में शामिल हो सकता है।

निष्कर्ष

IIT बॉम्बे में शुरू हुई यह Integrated CCUS Laboratory Facility भारत के वैज्ञानिक और तकनीकी इतिहास में एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है। यह परियोजना न केवल पर्यावरण संरक्षण की दिशा में बड़ा कदम है बल्कि आत्मनिर्भर भारत, विकसित भारत 2047 और Net-Zero लक्ष्य की दिशा में भी महत्वपूर्ण योगदान देगी।

भारत अब केवल तकनीक का उपभोक्ता नहीं बल्कि वैश्विक स्तर पर तकनीक विकसित करने वाला देश बन रहा है। आने वाले समय में यह Laboratory Facility देश की जलवायु रणनीति और औद्योगिक विकास दोनों को नई दिशा दे सकती है।

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